उत्तराखंड पुलिस मुख्यालय (PHQ) में लंबित पदोन्नति और तैनाती से जुड़े मामलों को लेकर पुलिस महकमे में चर्चाएं तेज हैं। 22 दिन पहले दरोगा से इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति के लिए विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद अब तक आदेश जारी नहीं हो सके हैं। वहीं, करीब डेढ़ माह पहले पुलिस उपाधीक्षक (CO) पद पर पदोन्नत हुए तीन अधिकारियों को भी अब तक नई तैनाती नहीं मिल सकी है।
पुलिस महकमे में इन दोनों मामलों को प्रमुख उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि जब सभी की नजर में रहने वाले मामलों में ही निर्णय लंबित हैं, तो ऐसे कई अन्य प्रकरण भी हो सकते हैं, जिनकी फाइलें पुलिस मुख्यालय में लंबित पड़ी हों।
विभागीय गलियारों में यह भी चर्चा है कि फाइलों के निस्तारण की गति बेहद धीमी है। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी सामने नहीं आई है। पुलिसकर्मियों का मानना है कि पदोन्नति और तैनाती जैसे मामलों का समयबद्ध निस्तारण न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को गति देगा, बल्कि पुलिस बल का मनोबल भी बढ़ाएगा।
वहीं, शासन द्वारा एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स (ANTF) के लिए सृजित नए पद भी अब तक केवल कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं। पदों के सृजन के बावजूद पुलिस मुख्यालय की ओर से आज तक इन पर किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की तैनाती नहीं की गई है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब शासन आवश्यक पदों का सृजन कर चुका है, तो आखिर नियुक्ति और तैनाती की प्रक्रिया किस कारण लंबित है। इससे नई इकाई के प्रभावी संचालन पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
उत्तराखंड जैसे अपेक्षाकृत छोटे राज्य में भी यदि पदोन्नति और तैनाती से जुड़े निर्णय लंबे समय तक लंबित रहें, तो इसका असर पूरे पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर पड़ना स्वाभाविक है। अब पुलिस महकमे की निगाहें पुलिस मुख्यालय पर टिकी हैं कि लंबित आदेशों पर आखिर कब मुहर लगेगी।
चर्चा तो यहां तक है कि इन दिनों विभाग के बड़े साहब की प्राथमिकता मुख्यालय नहीं है, बल्कि अपनी भविष्य की कुर्सी बताई जा रही है। महकमे में चर्चा है कि कुर्सी बचाने की कवायद के बीच विभागीय कामकाज की रफ्तार थम सी गई है। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि रोजमर्रा के प्रशासनिक फैसले भी फाइलों में कैद होकर रह गए हैं और पदोन्नति व तैनाती से जुड़े मामले लगातार लंबित होते जा रहे हैं।
विभागीय गलियारों में यह भी चर्चा है कि जब कोई पुलिसकर्मी अपनी पदोन्नति या तैनाती से जुड़े प्रकरण को लेकर मुख्यालय पहुंचता है, तो उसे बड़े साहब के ‘सख्त मिजाज’ का हवाला देकर वापस लौटा दिया जाता है। कुछ अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा ही कर्मचारियों के बीच यह धारणा भी बनाई जा रही है कि साहब के सामने फाइल ले जाना ही जोखिम का काम है, इसलिए अधीनस्थ अधिकारी भी छोटे कर्मचारियों के हित से जुड़ी पत्रावलियों को आगे बढ़ाने से बचते हैं।
नतीजा यह है कि पुलिस मुख्यालय की अलमारियों में धूल खा रही फाइलें अब विभाग की कार्यशैली पर ही सवाल खड़े करने लगी हैं। आखिर जब छोटे से राज्य में भी निर्णय लेने की रफ्तार इतनी सुस्त हो जाए, तो फिर व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

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