प्रदेश के सुदूर और पर्वतीय क्षेत्रों तक उच्च व तकनीकी शिक्षा की मजबूत पहुंच बनाने के लिए पुष्कर सिंह धामी सरकार ने निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना की राह को बेहद आसान कर दिया है। मंत्रिमंडल ने निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना से जुड़ी नीतियों और भूमि संबंधी जटिल मानकों में ऐतिहासिक संशोधन को मंजूरी दे दी है। सरकार के इस बड़े फैसले से अब राज्य के मैदानी और खासकर दुर्गम पर्वतीय जिलों में प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना तेजी से हो सकेगी, जिससे पहाड़ के युवाओं को अपने ही क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण और आधुनिक शिक्षा हासिल होगी।
जमीन की पुरानी बाध्यता समाप्त, अब निर्मित क्षेत्र होगा आधार
पूर्व में लागू व्यवस्था के अनुसार, प्रदेश में निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए पर्वतीय क्षेत्रों में कम से कम ढाई एकड़ और मैदानी क्षेत्रों में 10 एकड़ भूमि होना अनिवार्य था। विषम भौगोलिक परिस्थितियों और चकबंदी न होने के कारण पहाड़ों में एकमुश्त इतनी जमीन जुटाना निजी शैक्षणिक संस्थानों के लिए सबसे बड़ी बाधा बना हुआ था।
धामी कैबिनेट ने इस अड़चन को पूरी तरह खत्म करते हुए भूमि के बड़े रकबे की बाध्यता समाप्त कर दी है –
- पर्वतीय क्षेत्रों के लिए: अब सिर्फ़ न्यूनतम 2,500 वर्गमीटर क्षेत्र की व्यवस्था करनी होगी।
- मैदानी क्षेत्रों के लिए: कुल न्यूनतम 20,000 वर्गमीटर क्षेत्र का मानक तय किया गया है।
मैदान में 3 साल का चरणबद्ध कमिटमेंट, तभी मिलेगी NOC
मैदानी क्षेत्रों के लिए निर्धारित 20,000 वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र के मानक में सरकार ने संस्थानों की सुविधा के लिए चरणबद्ध निर्माण का प्रावधान किया है। इसके तहत:
- पहले वर्ष: संस्थान को कम से कम 10,000 वर्गमीटर क्षेत्र में निर्माण कार्य का ठोस कमिटमेंट देना होगा।
- दूसरे वर्ष: अतिरिक्त 5,000 वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र तैयार करने की प्रतिबद्धता दिखानी होगी।
- तीसरे वर्ष: शेष अतिरिक्त 5,000 वर्गमीटर निर्माण का कमिटमेंट पूरा करना होगा।
इस प्रकार तीन वर्षों में कुल 20,000 वर्गमीटर निर्माण का चरणबद्ध कमिटमेंट पूरा करने पर ही उच्च शिक्षा विभाग की ओर से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी किया जाएगा।
पहाड़ों में मजबूत होगा उच्च शिक्षा का ढांचा, रुकेगा पलायन
मानकों में इस शिथिलीकरण से मैदानी क्षेत्रों के साथ-साथ विशेषकर पर्वतीय जनपदों में देश-विदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के कैंपस खुलने का रास्ता साफ होगा। सुदूर पहाड़ी इलाकों में उच्च शिक्षण संस्थान स्थापित होने से स्थानीय छात्र-छात्राओं को अपने घर के नजदीक ही इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, मेडिकल और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सकेगी। इससे उच्च शिक्षा के लिए युवाओं को बड़े शहरों की ओर नहीं भटकना पड़ेगा और पर्वतीय क्षेत्रों से होने वाले पलायन पर भी प्रभावी अंकुश लगेगा।

