स्पेशल रिपोर्ट: हरिद्वार जमीन घोटाले के बाद शासन का ‘प्रहार’, 7 पन्नों की अधिसूचना से कसेगी अफसरशाही पर नकेल !!

हरिद्वार भूमि खरीद प्रकरण में मचे घमासान और सरकार की किरकिरी के बाद, उत्तराखंड के राजस्व विभाग ने सरकारी परियोजनाओं के लिए भूमि खरीद के दौरान की जा रही अनिमितताओं को खत्म करने के लिए नया सुरक्षा कवच तैयार किया है। सचिव राजस्व ने इसको लेकर 7 पन्नों के आदेश में सरकार ने ‘म्यूचुअल एग्रीमेंट’ (आपसी सहमति) की आड़ में होने वाले खेल को पूरी तरह बंद कर दिया है।

1. योजनाओं का गणित: बजट तय करेगा कमेटी का कद

आदेश में स्पष्ट किया गया है कि अब फाइल किस टेबल पर जाएगी, यह जमीन की कीमत तय करेगी:

  • लघु परियोजनाएं: यदि भूमि की कुल कीमत ₹10 करोड़ तक है, तो अध्यक्षता अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) करेंगे।
  • मध्यम एवं वृहद परियोजनाएं: यदि कीमत ₹10 करोड़ से अधिक है, तो कमेटी की कमान सीधे जिलाधिकारी (DM) के हाथ में होगी।

2. दरों का निर्धारण: अब मर्जी से नहीं, आंकड़ों से तय होगा दाम

DOON MIRROR ने जब आदेश की बारीकियों को खंगाला, तो सामने आया कि अब जमीन के रेट तय करने के लिए ‘3 साल का फॉर्मूला’ अनिवार्य कर दिया गया है:

  • आधार: जिस दिन प्रोजेक्ट का फैसला हुआ, उससे ठीक 3 वर्ष पूर्व तक के बैनामों (Sale Deeds) का औसत निकाला जाएगा।
  • सर्किल रेट का पेंच: यदि औसत दर सर्किल रेट से कम है, तो सर्किल रेट को ही आधार माना जाएगा। (जो भी अधिक हो, वही देय होगा)।
  • बाजार मूल्य का गुणांक: * शहरी क्षेत्र: बाजार मूल्य का अधिकतम 2 गुना
  • ग्रामीण क्षेत्र: बाजार मूल्य का अधिकतम 4 गुना

3. ‘भूमिहीन’ हुए तो मिलेगा 25% बोनस

सरकार ने विस्थापितों के दर्द को समझते हुए मुआवजे में अतिरिक्त स्लैब जोड़ा है:

  • यदि जमीन देने के बाद स्वामी पूर्णतः भूमिहीन हो जाता है, तो उसे 25% अतिरिक्त राशि मिलेगी।
  • यदि स्वामी की 50% से अधिक लेकिन 100% से कम जमीन ली जाती है, तो उसे 12% अतिरिक्त धनराशि दी जाएगी।

4. जवाबदेही की डेडलाइन: 2 महीने में रिपोर्ट, वरना स्पष्टीकरण

अब अफसर फाइलों को दबाकर नहीं बैठ सकेंगे। आदेश के मुताबिक:

  • समिति को आवेदन मिलने के 2 माह के भीतर जमीन की दर और मूल्य निर्धारित कर प्रस्ताव अनुमोदित करना होगा।
  • यदि एडीएम स्तर पर देरी हुई, तो जिलाधिकारी को स्पष्टीकरण देना होगा।
  • यदि जिलाधिकारी स्तर पर देरी हुई, तो मंडलायुक्त के सामने जवाबदेही तय होगी।

5. 60% सहमति की ‘कठोर’ शर्त

इस आदेश के तहत में एक बड़ा सुरक्षा कवच लगाया गया है। अब सरकार तभी हाथ डालेगी जब कुल प्रभावित भू-स्वामियों में से कम से कम 60 प्रतिशत अपनी लिखित पूर्व सहमति दे देंगे। इसके बिना ‘आपसी समझौते’ की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हो सकेगी।

6. अपील का अधिकार

यदि कोई भू-स्वामी समिति द्वारा तय की गई दरों से संतुष्ट नहीं है, तो वह निर्णय के 30 दिनों के भीतर संबंधित मंडलायुक्त (Commissioner) के पास अपील कर सकता है। कमिश्नर का फैसला अंतिम और बाध्यकारी होगा।


बता दें कि यह अधिसूचना सीधे तौर पर उन बिचौलियों और अधिकारियों पर चोट है जो कागजों में हेरफेर कर सर्किल रेट से कई गुना दाम पर जमीनें सरकार को बेच देते थे। अब हर रेट का आधार ‘पिछले 3 साल का डेटा’ होगा, जिससे भ्रष्टाचार की गुंजाइश न्यूनतम हो जाएगी।