अधर में लटकी 13 इंस्पेक्टरों की पदोन्नति, शासन आदेश के बाद भी एक माह से अटकी पदोन्नति !!

उत्तराखंड में पुलिस विभाग के 13 निरीक्षकों की पदोन्नति का मामला एक बार फिर प्रशासनिक खींचतान में उलझ गया है। शासन द्वारा स्पष्ट आदेश जारी किए जाने के बावजूद पुलिस मुख्यालय पिछले एक माह से कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाया है, जिससे अधिकारियों में नाराजगी और असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

गृह विभाग द्वारा 2 मार्च 2026 को जारी आदेश में निरीक्षक (नागरिक पुलिस), अभिसूचना और सशस्त्र पुलिस/प्रतिसार निरीक्षक संवर्ग के अधिकारियों को “पुलिस उपाधीक्षक (कनिष्ठ वेतनमान)” पद पर पदोन्नति देने की स्वीकृति दी गई थी। आदेश में चयन वर्ष 2024-25 और 2025-26 के तहत कुल 13 अधिकारियों के नाम शामिल किए गए थे।

शासन के इस निर्णय के बाद अपेक्षा थी कि पुलिस मुख्यालय तत्काल पदस्थापन और कार्यभार ग्रहण की प्रक्रिया पूरी करवाएगा, लेकिन एक माह बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।

सूत्रों के अनुसार, पुलिस मुख्यालय एक इंस्पेक्टर की पदोन्नति को लेकर असहज है और उसी वजह से पूरी प्रक्रिया अटक गई है। बताया जा रहा है कि इस एक मामले पर आपत्ति के चलते अन्य सभी 12 अधिकारियों की पदोन्नति भी लंबित पढ़ी हुई है, जिससे विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।

डीपीसी पर भी उठे सवाल

इस पूरे मामले में DPC की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आ गई है। चर्चा है कि जिस इंस्पेक्टर की पदोन्नति अब रोकी जा रही है, उससे जुड़े तथ्यों या कथित खामियों का संज्ञान डीपीसी के समय क्यों नहीं लिया गया ? क्या उस समय DPC में मौजूद शासन व मुख्यालय के अधिकारी इन बिंदुओं से अनजान थे ? या फिर बाद में नए सिरे से आपत्तियां खड़ी की जा रही हैं? यह सवाल अब विभाग के भीतर भी जोर पकड़ रहा है।

पत्राचार में उलझा मामला

शासन और पुलिस मुख्यालय के बीच लगातार पत्राचार चल रहा है। शासन की ओर से जहां आदेश का अनुपालन करने का दबाव बनाया जा रहा है, वहीं मुख्यालय विभिन्न कानूनी और प्रक्रियात्मक बिंदुओं का हवाला देते हुए निर्णय टालता नजर आ रहा है।

अधिकारियों में बढ़ी नाराजगी

पदोन्नति सूची में शामिल अधिकारियों के बीच इस देरी को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि यदि किसी एक अधिकारी को लेकर विवाद है, तो बाकी के मामलों में निर्णय रोका जाना न्यायसंगत नहीं है।

छोटे अधिकारी पिसे, बड़े अफसरों को समय पर पदोन्नति

ऐसे प्रकरणों में अक्सर छोटे अधिकारी ही पिसते नजर आते हैं। विभागीय स्तर पर जहां कॉन्स्टेबल स्तर से PPS अधिकारियों की पदोन्नति महीनों तक अटकी रहती है, वहीं वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों, विशेषकर आईपीएस अधिकारियों को समयबद्ध तरीके से हर वर्ष 1 जनवरी को पदोन्नति दे दी जाती है। हैरानी की बात यह है कि कई मामलों में पद रिक्त हों या न हों, पदोन्नति प्रक्रिया प्रभावित नहीं होती, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर एक्स-कैडर पद तक सृजित कर दिए जाते हैं। ऐसे में निचले स्तर के अधिकारियों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या नियम और प्रक्रियाएं केवल उन्हीं के लिए सख्ती से लागू होती हैं।

प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। शासन के स्पष्ट आदेश के बावजूद निर्णय न ले पाना विभागीय समन्वय की कमी को दर्शाता है।

अब देखना होगा कि शासन और पुलिस मुख्यालय के बीच चल रहा यह पत्राचार कब खत्म होता है और 13 अधिकारियों को उनकी बहुप्रतीक्षित पदोन्नति कब मिल पाती है।