उत्तराखंड में भूजल दोहन / अंडर ग्राउंड बोरिंग को लेकर सरकार का बड़ा एक्शन, अब इस शासनादेश के नियमों के तहत ही करवा सकेंगे बोरिंग, पुरानी बोरिंग के लिए भी लेनी होगी NOC !!

उत्तराखंड सरकार ने राज्य में लगातार गिरते भूजल स्तर और बढ़ते जल संकट को देखते हुए भूजल दोहन को नियंत्रित करने के लिए बड़ा और सख्त फैसला लिया है। सिंचाई विभाग की ओर से जारी शासनादेश में गैर कृषि उपयोग के लिए भूजल पर जल मूल्य/प्रभार निर्धारित कर दिए गए हैं। यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू होगा।

सरकार ने साफ किया है कि कृषि कार्यों और सरकारी पेयजल योजनाओं को छोड़कर अब उद्योगों, व्यवसायिक संस्थानों, खनन परियोजनाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यों, रेजिडेंशियल अपार्टमेंट्स और ग्रुप हाउसिंग सोसायटी द्वारा भूजल उपयोग पर शुल्क देना होगा।

चार श्रेणियों में बांटे गए भूजल क्षेत्र

शासनादेश में राज्य के भूजल क्षेत्रों को चार श्रेणियों — सुरक्षित क्षेत्र, अर्द्ध गंभीर क्षेत्र, गंभीर क्षेत्र और अतिदोहित क्षेत्र में वर्गीकृत किया गया है। क्षेत्र की स्थिति जितनी अधिक गंभीर होगी, जल उपयोग पर शुल्क भी उतना अधिक लगेगा।

सरकार ने विशेष रूप से उन उद्योगों पर सख्ती दिखाई है जहां पानी का उपयोग “रॉ मटेरियल” के रूप में होता है, जैसे कोल्ड ड्रिंक, मिनरल वाटर, बेवरेज इंडस्ट्री आदि। अतिदोहित क्षेत्रों में ऐसे उद्योगों पर सबसे अधिक दरें लागू की गई हैं।

उद्योगों के लिए अलग-अलग दरें

शासनादेश के अनुसार उद्योगों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है —

  • प्रोसेस इंडस्ट्री (Cooling/Washing आदि)
  • पानी को कच्चे माल के रूप में उपयोग करने वाले उद्योग
  • अन्य व्यवसायिक उपयोग

सुरक्षित क्षेत्रों में जहां 50 घनमीटर प्रतिदिन तक उपयोग पर न्यूनतम शुल्क तय किया गया है, वहीं अतिदोहित क्षेत्रों में 5000 घनमीटर प्रतिदिन से अधिक उपयोग करने पर भारी प्रभार लगाया जाएगा। मिनरल वाटर और बेवरेज उद्योगों के लिए यह दरें सबसे अधिक रखी गई हैं।

अपार्टमेंट और ग्रुप हाउसिंग सोसायटी भी दायरे में

राज्य सरकार ने रेजिडेंशियल अपार्टमेंट्स और ग्रुप हाउसिंग सोसायटी को भी इस दायरे में शामिल किया है। शासनादेश के अनुसार 25 घनमीटर प्रतिमाह तक भूजल उपयोग पर कोई शुल्क नहीं लगेगा, लेकिन इससे अधिक उपयोग पर निर्धारित दरों के अनुसार प्रभार देना होगा।

हर साल बढ़ेगा जल शुल्क

सरकार ने यह भी तय किया है कि निर्धारित जल मूल्य/प्रभार में प्रत्येक वर्ष 1 अप्रैल से 5 प्रतिशत की वृद्धि की जाएगी। यानी आने वाले वर्षों में भूजल उपयोग और महंगा होता जाएगा।

रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य

300 वर्गमीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल वाले भूखंडों पर वर्षा जल संचयन प्रणाली (Rain Water Harvesting Structures) लगाना अनिवार्य किया गया है। सरकार का मानना है कि इससे भूजल स्तर को पुनर्भरण में मदद मिलेगी।

रिसाइक्लिंग करने वाले उद्योगों को राहत

जो उद्योग पानी का रिसाइक्लिंग, रीयूज और रीजेनरेशन करेंगे तथा कम से कम 25 प्रतिशत जल बचत सुनिश्चित करेंगे, उन्हें भूजल प्रभार में 10 प्रतिशत तक की छूट दी जाएगी।

अवैध भूजल दोहन पर सख्त कार्रवाई

शासनादेश में स्पष्ट किया गया है कि बिना वैध अनुमति के भूजल निकासी करने वाले संस्थानों और फर्मों से दोगुना शुल्क वसूला जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर ऐसे संस्थानों को सील करने, बिजली कनेक्शन काटने और पर्यावरणीय कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

गंभीर और अतिदोहित क्षेत्रों में नई पाबंदियां

सरकार ने आदेश में कहा है कि अतिदोहित क्षेत्रों में किसी भी नए बड़े उद्योग को भूजल उपयोग के लिए एनओसी नहीं दी जाएगी। वहीं गंभीर और अतिदोहित क्षेत्रों में केवल विशेष परिस्थितियों में अनुमति पर विचार होगा, वह भी इस शर्त के साथ कि संबंधित इकाई को Rainwater Harvesting, Recycling और Reuse सिस्टम स्थापित करना होगा।

इसके अलावा गंभीर और अतिदोहित क्षेत्रों में प्रतिदिन 1000 घनमीटर से अधिक भूजल उपयोग करने वाले औद्योगिक संस्थानों को अनुमति नहीं देने का भी प्रावधान रखा गया है।

ऑनलाइन निगरानी और बिलिंग सिस्टम बनेगा

सिंचाई विभाग को निर्देश दिए गए हैं कि भूजल निकासी की मात्रा मापने के लिए Automated Data Logger युक्त Water Meter लगाए जाएं। साथ ही जल शुल्क की वसूली के लिए Automated Online Payment System भी तैयार किया जाएगा।

सिंचाई विभाग करेगा निगरानी

जब तक उत्तराखंड जल संसाधन प्रबंधन और नियामक आयोग पूरी तरह गठित नहीं हो जाता, तब तक भूजल उपयोग की अनुमति, एनओसी जारी करने, बिलिंग और शुल्क संग्रह की जिम्मेदारी सिंचाई विभाग के पास रहेगी।