किसान सुखवंत सिंह आत्महत्या प्रकरण के बाद जिन कर्मचारियों को जनपद में महत्वपूर्ण तैनाती दी गई थी, उन्हें अब पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर चमोली व रुद्रप्रयाग स्थानांतरित कर दिया गया है। आदेश जारी होते ही दोनों जनपदों के व्यापारियों में रोष व्याप्त हो गया और विरोध शुरू हो गया।

यह विरोध स्वाभाविक भी है, क्योंकि इससे एक गंभीर सवाल खड़ा होता है—क्या बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम के स्थली जनपद अब विभिन्न विभागों के दागदार या विवादित कर्मचारियों के लिए पनिशमेंट पोस्टिंग अथवा डंपिंग यार्ड बनते जा रहे हैं? धार्मिक, संवेदनशील और पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण इन जनपदों के साथ ऐसा दृष्टिकोण न केवल स्थानीय जनता की भावनाओं को आहत करता है, बल्कि प्रशासनिक सोच पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
पर्वतीय और विकट भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में ऐसे अधिकारियों की तैनाती होनी चाहिए, जिनकी सोच विकासोन्मुख हो, जो अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही को प्राथमिकता दें तथा स्थानीय आवश्यकताओं को समझते हुए क्षेत्र को संवारने का संकल्प रखते हों। इन क्षेत्रों को प्रयोगशाला या दंडस्थल की तरह देखने के बजाय, सक्षम और संवेदनशील प्रशासनिक नेतृत्व प्रदान किया जाना चाहिए, ताकि विकास, विश्वास और व्यवस्था—तीनों को मजबूती मिल सके।
उल्लेखनीय है कि शासन को इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि विभिन्न विभागों के आरोपित या संदिग्ध कर्मचारियों के साथ क्या नीति अपनाई जानी चाहिए। क्या उन्हें दंड के नाम पर सीमांत और तीर्थस्थलीय जनपदों में तैनात किया जाना उचित है ?, या फिर जांच पूरी होने और दोष सिद्ध होने तक उन्हें अकादमी अथवा गैर-संवेदनशील पदों पर रखा जाना चाहिए ?
स्पष्ट नीति के अभाव में ऐसे निर्णय न केवल जन आक्रोश को जन्म देते हैं, बल्कि शासन-प्रशासन की निष्पक्षता और संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े करते हैं।

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